| बिजली देश में त्वरित आर्थिक विकास और औद्योगिकीकरण का मुख्य संचालक है। यह एक महत्वपूर्ण मूल संरचना है जिस पर अनेकानेक आर्थिक क्षेत्रकों का विकास निर्भर करता है। भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है जो विश्व की कुल वार्षिक ऊर्जा खपत का 3.5 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है। भारतीय उद्योग को विश्वसनीय और गुणवत्ता विद्युत प्रतिस्पर्द्धी दर पर उपलब्धता इसे वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी बनाने के लिए अनिवार्य है और रोजगार सृजन की अपार क्षमता का दोहन करने में इसे समर्थ बनाने के लिए अनिवार्य है। वर्षों से भारतीय विद्युत उद्योग ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्शायी है। विदेशी प्रत्यक्ष 100 प्रतिशत तक उत्पादन, पारेषण और वितरण मार्ग में स्वत: मार्ग के द्वारा अनुमत है।
'विद्युत मंत्रालय' देश में विद्युत ऊर्जा के समग्र विकास के लिए मुख्य प्राधिकरण है। यह योजना बनाने और निति निर्माण करने, निवेश निर्णय के लिए परियोजनाओं का प्रक्रियान्वयन, विद्युत परियोजनाओं की निगरानी और उनका क्रियान्वयन, तथा विद्युत उत्पादन, पारेषण और वितरण के संबंध में कानूनों का प्रशासन और अधिनियमन के लिए जिम्मेदार है।
विद्युत उद्योग में अधिकाधिक निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए समय-समय पर अनेकानेक नीतिगत सुधार और पहले की गई हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है 'विद्युत अधिनियम, 2003' का अधिनियम, जिसका उद्देश्य बिजली के उत्पादन, पारेषण, वितरण, व्यापार और उपयोग संबंधी कानूनों को समेकित करना, विद्युत क्षेत्रक में प्रतिस्पर्द्धा का संवर्धन करना, और सभी क्षेत्रों को बिजली की पर्यावरणीय रूप से अनुकूल नीतियों को संवर्धन, बिजली चोरी के मामले में कठोर दंड की व्यवस्था करना, आदि चाहता है। अधिनियम के तहत केन्द्रीय सरकार ने 'राष्ट्रीय विद्युत नीति' और राष्ट्रीय विद्युत योजना तैयार की है।
राष्ट्रीय विद्युत नीति का लक्ष्य विद्युत क्षेत्रक के त्वरित विकास, ऊर्जा संसाधनों, प्रौद्योगिकी, उत्पादन अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संबंधी मुद्दों को मद्देनजर रखते हुए उपभोक्ताओं और दूसरे जोखिम धारकों के हितों की रक्षा के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करना है। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण पांच वर्षों में एक बार राष्ट्रीय विद्युत योजना बनाता है और नीति के अनुसार उसमें समय-समय पर संशोधन करते रहता है। योजना में विभिन्न क्षेत्रों के लिए अल्पावधिक और दीर्घावधिक मांगों का पूर्वानुमान लगाना तथा उत्पादन और पारेषण में क्षमता वर्धन के लिए क्षेत्रों/स्थानों का सुझाव देना है।
विद्युत (संशोधन) अधिनियम, 2007 की घोषणा विद्युत अधिनियम, 2003 के कुछ प्रावधानों को संशोधित करने के लिए घोषित किया गया है। संशोधन अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:-
- केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों के साथ संयुक्त रूप से ग्राम और छोटे रिहायशी गांवों सहित सभी क्षेत्रों को ग्रामीण विद्युतीकरण मूलसंरचना एवं घरों के विद्युतीकरण के माध्यम से विद्युत तक अभिगम्यता प्रदान करने का प्रयास करें।
- केप्टिव इकाइयों से बिक्री के लिए किसी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है।
- विषम सब्सिडी को हटाने के लिए प्रावधानों का विलोपन। विषम सब्सिडी की कमी के लिए प्रावधान जारी रहेंगे।
- छेड़छाड़ किए गए मीटरों के उपयोग और इनका अनधिकृत प्रयोजन के लिए चोरी की परिभाषा को विस्तार किया गया है। चोरी को विशिष्ट रूप से संज्ञान योग्य और गैर जमानती बनाया गया है।
विद्युत क्षेत्रक में अवसर निम्नलिखित प्रबल क्षेत्रों में विनियमन और विकास में निहित हैं :-
- विद्युत उत्पादन
ताप, पनबिजली और नाभिकीय ऊर्जा भारत में विद्युत उत्पादन के मुख्य स्रोत हैं। कुल संस्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 1,47,402.81 मेगावॉट (31 दिसम्बर, 2008 के अनुसार), जिसमें 93,392.64 मेगावॉट (थर्मल); 36,647.76 मेगावॉट (हाइड्रो); 4,120 मेगावॉट (न्यूक्लियर); और 13,242.41 मेगावॉट (अक्षय ऊर्जा स्रोत) शामिल हैं। वर्ष 2008-09 ( दिसम्बर 2008 तक) के दौरान अखिल भारतीय तापीय संयंत्र लोड फेक्टर (पीएलएफ) 75.13 प्रतिशत (अनंतिम) रहा है।
अधिकाधिक बल देश में व्यवहार्य पनबिजली क्षमता के सम्पूर्ण विकास पर दिया गया है। पन विद्युत स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। मंत्रालय ने पन विद्युत परियोजनाओं से क्षमता वर्धन त्वरित करने के लिए अनेकानेक कदक उठाए हैं। उदाहरण के लिए :- पनबिजली क्षेत्रक के लिए अधिक बजटीय आबंटन, नई पन बिजली परियोजनाओं के लिए निवेश अनुमोदन, राज्य क्षेत्रक परियोजनाओं का संवर्धन करना, जो पिछडे हुए वर्ग थे या प्रगति नहीं कर सकते थे अंतरराज्यीय विवादों के कारण मंजूरी अंतरण आदि के लिए प्रक्रिया का सरलीकरण।
आयातित कोयला आधारित ताप विद्युत केन्द्र विशेषकर तटीय स्थानों पर को उनकी आर्थिक व्यावहार्यता के आधार पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। विद्युत उत्पादन के लिए ईंधन के रूप में गैस का उपयोग उचित मूल्य पर इसकी उपलब्धता पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस का उपयोग गैस टर्बाइन/संयुक्त चक्र गैस टर्बाइन (जीटी/सीसीजीटी) केन्द्रों पर किया जा रहा है। एक राष्ट्रीय गैस ग्रिड जिसमें देश के विभिन्न भाग शामिल हैं तथा आयातित एलएनजी आधारित विद्युत संयंत्र विद्युत की संभावित स्रोत के रूप में कार्य करता है। बेस लोड मांग पूरी करने के लिए नाभिकीय विद्युत संयंत्रों की स्थापना विभिन्न स्थानों पर की जा रही है। निजी और सरकारी दोनो क्षेत्रकों के निवेश की देश में नाभिकीय उत्पादन क्षमता का सृजन करने के लिए कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त विदेशी निवेशकों द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली और उपकरणों के विनिर्माण निम्न पर आधारित हैं :- पवन, सौर-फोटो वोल्टेक, सौर ताप, लघु पनबिजली, बायोमास, सह-उत्पादन, जैव-ताप, ज्वारीय और शहरी और औद्योगिक अवशेष आधारित विद्युत परियोजनाएं।
वर्ष 2012 तक प्रति व्यक्ति 1000 यूनिट से अधिक विद्युत की उपलब्धता मुहैया कराने के लिए यह अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2002-12 की अवधि के दौरान 1,00,000 मेगावॉट से भी अधिक आवश्यकता आधारित क्षमता वर्धन की आवश्यकता होगी। राष्ट्रीय विद्युत नीति के उद्देश्य पूरे करने के लिए 11वीं योजना हेतु 78,577 मेगावॉट का क्षमतावर्धन प्रस्तावित है। इससे विद्युत क्षेत्र को 9.5 प्रतिशत की वृद्धि मिलने की आशा है।
मंत्रालय ने देश में नई उत्पादन क्षमता के वर्धन के लिए अनुकूल माहौल का सृजन करने के लिए अनेकानेक सुधार के उपाय आरंभ किए हैं उदाहरण के लिए 'अल्ट्रा मेगा विद्युत परियोजना (यूएमपीपी)' के विकास की पहचान तीव्रता क्षेत्र के रूप में की गई है। ये भारत में बड़े आकार की कोयला आधारित परियोजनाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक में 4000 मेगावॉट या इससे अधिक क्षमता है। ये परियोजनाएं अनेकानेक राज्यों/इन राज्यों में स्थित वितरण कम्पनियों की विद्युत की आवश्यकताएं पूरी करेगी और उनका विकास बनाओ अपनाओ और प्रचालन करो के आधार पर किया जा रहा है।
- विद्युत पारेषण
विद्युत पारेषण को भारी मात्रा में विद्युत का अंतरण वोल्टेज पर सामान्यत: 132 किलोवॉट और उससे अधिक वोल्टेज के रूप में पारिभाषित किया जाता है। सुनियोजित और सुदृढ़ पारेषण नेटवर्क पारेषण क्षमता और उत्पादन सुविधा का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित करता है। पारेषण प्रणाली के लिए सम्पूर्ण देश को पांच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, अर्थात उत्तरी क्षेत्र, उत्तर पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र और पश्चिमी क्षेत्र। परस्पर जुड़ी हुई पारेषण प्रणाली प्रत्येक क्षेत्र के भीतर क्षेत्रीय ग्रिड कहलाती है। सुदृढ़ राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड का निर्माण विद्युत उद्योग के विकास और समर्थ दरों पर सबके लिए विद्युत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सुविधाकर बनाने के लिए मानी गई है।
केन्द्रीय पारेषण उपयोगिता (सी टी यू) राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पारेषण प्रणाली की योजना बनाने और विकास और इसके अंतरराष्ट्रीय पारेषण प्रणाली पर खुली पहुंच मुहैया कराने के लिए भी जिम्मेदार है। जबकि राज्य पारेषण उपयोग अंतरा-राज्य पारेषण प्रणाली की योजना बनाने और विकास करने के लिए जिम्मेदार है। पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. / पावरग्रिड की स्थापना क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड की स्थापना और प्रचालन के लिए की गई है ताकि क्षेत्र के भीतर और क्षेत्रों के बीच विश्वसनीयता सुरक्षा और किफायती रूप से सुदृढ़ वाणिज्यिक सिद्धांतों पर विद्युत अंतरण सुकर बनाया जा सके।
11वीं योजना के लिए देश की पारेषण संभावित योजना में वर्ष 2012 तक 60,000 सीकेएम पारेषण नेटवर्क से अधिक के वर्धन के माध्यम से राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड को सुदृढ़ बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। यह समेकित ग्रिड देश में उत्पन्न विद्युत का 60 प्रतिशत ले जाएगी। मौजूदा अंतर - क्षेत्रीय विद्युत अंतरण क्षमता 17,000 मेगावॉट है, जिसे ''पारेषण सुपर राजमार्ग'' के सृजन के माध्यम से वर्ष 2012 तक लगभग 37,700 मेगावॉट तक बढ़ाया जाना है। 11वीं योजना के अतिरिक्त अनुमानित उत्पादन क्षमता के आधार पर केन्द्रीय क्षेत्र में लगभग 75,000 करोड़ रु. और राज्य क्षेत्र में लगभग 60,000 करोड़ रु. के निवेश की कल्पना की गई है।
भारत सरकार ने निजी क्षेत्रक से संसाधन जुटाने के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा निर्देशों में पारेषण में निजी क्षेत्रक भागीदारी के लिए दो विशिष्ट मार्गों की परिकल्पना की गई है, अर्थात :- (i) संयुक्त उद्यम मार्ग जहां सी टी यू/एस टी यू के पास कम से कम 26 प्रतिशत इक्विटी और शेष का अंशदान संयुक्त उद्यम के भागीदार द्वारा किया जाएगा; और (ii) स्वतंत्र निजी पारेषण कम्पनी मार्ग जहां 100 प्रतिशत इक्विटी निजी कम्पनी के पास होगी।
नवम्बर 2007 के दौरान पावर ग्रिड ने लगभग 66,000 एमवीए की रूपांतरण क्षमता के साथ 108 सब स्टेशनों सहित लगभग 64,300 सीकेटी किलोमीटर पारेषण लाइनों का प्रचालन किया है। देश में उत्पादित कुल विद्युत का लगभग 45 प्रतिशत पावर ग्रिड पारेषण नेटवर्क पर अंतरित किया जा रहा है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में पावर ग्रिड की पारेषण प्रणाली में लगभग 5070 सीकेटी शामिल है। पारेषण लाइनों में 864 सीकेटी किलो मीटर पूर्वोत्तर क्षेत्र तथा पूर्वी क्षेत्र एवं 14 सबस्टेशनों के बीच की अंतर-क्षेत्रीय लाइनों को शामिल किया गया है।
- विद्युत वितरण
विद्युत व्यापार श्रृंखला में वितरण अति महत्वपूर्ण भाग है। विद्युत मंत्रालय देश के विद्युत वितरण नेटवर्क में सुधार लाने के लिए अनेकानेक पहलें और नीतिगत उपाय करता रहा है। उदाहरण के लिए त्वरित विद्युत विकास और सुरक्षा कार्यक्रम (ए पी डी आर पी) की शुरूआत निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ की गई है :-
- राज्य विद्युत उपयोगिता की वित्तीय व्यवहार्यता सुधारना;
- राज्य बिजली बोर्ड की वाणिज्यिक व्यवहार्यता सुधारना;
- कुल तकनीकी और वाणिज्यिक हानियों को लगभग 15 प्रतिशत तक कम करना;
- ग्राहक संतुष्टि सुधारना; और
- विद्युत आपूर्ति की विश्वसनीयता और गुणवत्ता बढ़ाना।
एपीडीआरपी में दो घटक हैं, नामत: :- (i) निवेश के घटक-शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में घने विद्युतीकृत हिस्सों में उप - पारेषण और वितरण प्रणाली के सुदृढ़ीकरण तथा उन्नयन के लिए। इसमें विशेष श्रेणी वाले राज्यों और गैर विशेष श्रेणी वाले राज्यों को अनुदान के रूप में परियोजना लागत की 90 प्रतिशत और 25 प्रतिशत राशि की केन्द्रीय सहायता शामिल है। शेष राशि की व्यवस्था वित्तीय संस्थानों / अपने संसाधनों; और (ii) प्रोत्साहन का घटक -नकदी की हानि को कम करने के लिए प्रोत्साहनकारी / प्रेरक जनोपयोगिताओं के लिए, जो गणना की गई सब्सिडी का निवल और प्राप्ति योग्य है। वर्ष 2000-01 को आधार वर्ष के रूप में लिया गया है।
- ग्रामीण विद्युतीकरण
ग्रामीण विद्युतीकरण में विभिन्न उत्पादनोन्मुखी कार्यकलापों के लिए ऊर्जा की आपूर्ति शामिल है जैसे लघु सिंचाई, ग्रामीण उद्योग आदि तथा ग्रामों के विद्युतीकरण के लिए। एक गांव को विद्युतीकृत घोषित किया जाता है यदि:- (i) मूलभूत अवसंरचना जैसे कि वितरण ट्रांसफार्मर और वितरण लाइनें अधिवास वाले स्थान के गांव की राजस्व सीमा के अंदर से गुजरती हों, जिसमें एक दलित बस्ती / पुरवा शामिल हो, लागू है; (ii) सार्वजनिक स्थानों जैसे विद्यालय, पंचायत कार्यालय, स्वास्थ्य केन्द्र, डिस्पेंसरी, समुदाय केन्द्र आदि जैसे स्थानों पर बिजली प्रदान की गई है; (iii) वितरण ट्रांसफार्मर और एलटी लाइनों की रेटिंग गांव में प्रदान की जाए, जिसे पंचायत / जिला परिषद / जिला प्रशासन के परामर्श सहित कनेक्शन की अनुमानित संख्या के अनुसार उन प्रशासकों द्वारा अंतिम रूप दिया जाए, जो कार्य के पूरा होने पर ग्राम विद्युतीकरण के अनिवार्य प्रमाणपत्र जारी करेंगे; और (iv) विद्युतीकृत घरों की संख्या कम से 10 प्रतिशत कुल गांव के घरों का हो।
'ग्रामीण विद्युतीकरण' ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में देखा जाता है। इसका लक्ष्य आर्थिक विकास तेज करना और कृषि एवं ग्रामीण उद्योगों में उत्पादकता उपयोगों के लिए निवेश के रूप में विद्युत मुहैया करने द्वारा रोजगार का सृजन करना है। तदनुसार केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारें दोनों ग्रामीण घरों के लिए बिजली का अभिगमन हासिल करने के लिए सभी प्रयास कर रही हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह उचित दर पर समाज के गरीब और सीमान्त वर्गों तक पहुंचे।
भारतीय ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आर ई सी) केन्द्रीय स्तर पर आगामी पांच वर्षों में सभी घरों को बिजली का अभिगमन देने के राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम द्वारा निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के लिए नोडल एजेंसी है। इसकी स्थापना पूरे देश में ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजनाओं का वित्त पोषण और संवर्धन करने के लक्ष्य के साथ की गई है। परियोजनाओं में गांवों का विद्युतीकरण, जिसमें जन जातीय गांव और दलित बस्ती शामिल हैं, पम्प सेटों को ऊर्जावान बनाना, लघु, कृषि आधारित एवं ग्रामीण उद्योगों के लिए विद्युत की व्यवस्था, ग्रामीण घरों को और गलियों को प्रकाशित करना।
ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण के लिए समय-समय पर अनेकानेक कार्यक्रम आरंभ किए गए हैं। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-
- प्रधान मंत्री ग्रामोद्योग योजना (पीएमजीवाई)
- कुटीर ज्योति योजना
- त्वरित ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम
- एक लाख गांवों और एक करोड़ घरों का त्वरित विद्युतीकरण
- राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आर जी जी वी वाई)
दिल्ली और गोवा को छोड़ कर सभी राज्यों ने आर जी जी वी वाई के तहत करार पर हस्ताक्षर किए हैं। वर्ष 2007-08, के दौरान 5691 गैर विद्युतीकृत गांवों का विद्युतीकरण किया गया ( 11.01.2008 के अनुसार)। राजीव गांधी ग्राम विद्युतीकरण योजना को जारी रखने के लिए सरकार द्वारा 11वीं योजना में अनुमोदन दिया गया ताकि सभी घरों को बिजली की पहुंच प्रदान करने का लक्ष्य पूरा किया जा सके, लगभग 1.15 लाख गांवों का विद्युतीकरण किया जा सके और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 2.34 करोड़ घरों को बिजली का कनेक्शन दिया जा सके।
- XI योजना के दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्युत विकास की जारी परियोजनाएं, जिन से लाभ मिलने की आशा है:-
- केन्द्रीय क्षेत्र की परियोजनाएं
- नीपको परियोजनाएं (हाइड्रो)
- कमेंग एचईपी (600 मेगावॉट) - अरुणाचल प्रदेश
- एनएचपीसी परियोजनाएं (तापीय)
- तिस्ता-V (510 मेगावॉट) - सिक्किम
- सुबनसिरी लोअर (2000 मेगावॉट) - अरुणाचल प्रदेश
- एनटीपीसी परियोजनाएं (तापीय)
- बोंगई गांव टीपीएस (3X250 मेगावॉट) एनटीपीसी द्वारा - असम
- संयुक्त उद्यम परियोजनाएं (तापीय)
- त्रिपुरा गैस (750 मेगावॉट) पावर डेवलपमेंट कंपनी, आईएलएफ एण्ड एफएस, ओएनजीसी और त्रिपुरा सरकार का संयुक्त उद्यम
- राज्य क्षेत्र की परियोजनाएं
- मेंटडू (2x42 मेगावॉट) – मेघालय
- लकवा अपशिष्ट ताप प्राप्ति परियोजना (भाप टर्बाइन-37.2 मेगावॉट) - असम
- निजी क्षेत्र की परियोजनाएं
- तिस्ता चरण- III (6x 200 मेगावॉट) - सिक्किम
- कुजाचेन (2x 49.5 मेगावॉट) – सिक्किम
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