प्रत्येक आकांक्षी उद्यमी सफलता तथा अभिवृद्धि के सपनों के साथ व्यवसाय आरम्भ करता है। किन्तु संगठन के विस्तार की संपूर्ण प्रकिया के दौरान, यह संभव है कि वह स्थायी आधार पर लाभप्रद तरीके से व्यवसाय को जारी रखने में असमर्थ रहे। अत: उसके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह व्यवसाय संगठन की किस्म/स्वरूप को परिवर्तित करें। यह परिवर्तन सरकारी कंपनी से निजी कंपनी में या विपर्यवेन हो सकता है। कंपनी अधिनियम, 1956 में ऐसे रुपांतरणों के लिए प्रावधान तथा प्रक्रियाविधियां निहित हैं।
यह भी संभव है कि उद्यमी को अपनी कंपनी को परिसमाप्त या बंद करना पड़े। व्यवसाय एकक को बंद करने से संदर्भ कंपनी के विभिन्न कार्यात्मक तथा साथ ही कार्यात्मक भिन्न क्षेत्रों को बंद करने से है। किसी कंपनी को बंद करने के लिए उत्तरदायी विभिन्न स्थितियों में निम्न शामिल हैं :-
- अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी;
- अत्यधिक प्रतिस्पर्धा;
- उत्पादन की पुरानी तकनीकों का प्रयोग;
- किसी संगठन में निकृष्ट अवसंरचनात्मक सुविधाएं;
- कामगारों तथा व्यापार कामगारों में असंतोष; श्रमिकों तथा प्रबंधकों के बीच संघर्ष, तालाबंदी, हड़तालें इत्यादि;
- संगठन की विभिन्न गतिविधियों का वित्तपोषण करने के लिए संसाधनों/निधियों का अभाव।
यद्यपि किसी व्यवसाय की किस्म को परिवर्तित करना अथवा व्यवसाय संघटन को परिसमाप्त करना किसी उद्यमी के लिए एक नकारात्मक अनुभव है, इससे उसके द्वारा निवेशित संसाधन कहीं अन्यन्न अधिक उत्पादक एवं लाभप्रद प्रयोग के लिए निर्युक्त हो जाते हैं। अन्य शब्दों में, इस का अर्थ उसके लिए बेहतर अवसर तथा अनन्वेषित चुनौतियां हैं। साथ ही भारत सरकार ने अनेक नीतियां तथा योजनाएं अधिनियमित की हैं जो न केवल किसी व्यवसाय के सहज परिसमापन में उद्यमी की सहायता करते हैं बल्कि नवीनतर क्षेत्रों में संसाधनों का पुनर्निवेश करने में भी उसकी सहायता करते हैं। |