भारतीय उद्यमियों द्वारा विदेशी निवेशों को विनियमित करने की नीति तथा सभी अन्य संबंधित पहलू जैसे वित्त तथा बीमा समय समय पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी परिपत्रों तथा दिशानिर्देशों द्वारा शासित होते हैं। दिशानिर्देशों तथा परिपत्रों को किसी कानून या विनियमन के विभिन्न प्रावधानों को स्पष्ट करने तथा उनकी व्याख्या करने के प्रयोजनार्थ रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचित दस्तावेज़ों के रूप में परिभाषित किया गया हैं।
उदाहरणार्थ, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) एक व्यापक अधिनियम है जो विदेशों में निवेश सहित सभी विदेशी मुद्रा लेनदेनों को विनियमित करता है। यही वह अधिनियम है जिसके अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक पूंजी बहिप्रर्वाहों के विभिन्न पहलुओं का प्रबंधन करने के लिए विभिन्न परिपत्र, दिशानिर्देश, नियम तथा अधिसूचनाएं इत्यादि जारी करने के लिए प्राधिकृत है। विदेशों में कारोबार करने से जुड़ा एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिशानिर्देश है "विदेशों में संयुक्त उद्यमों तथा पूर्णतया स्वामित्वाधीन सहायक कंपनियों में भारतीय प्रत्यक्ष निवेश हेतु दिशानिर्देश"।
इन परिपत्रों तथा दिशानिर्देशों का व्यापक लक्ष्य निम्न को सुनिश्चित करना है :-
- एक पारदर्शी नीतिगत ढांचा जो भारतीय व्यवसायी को अपने व्यापार की आयोजना बनाने में समर्थ बनाए तथा वह देश से बाहर संभावी सहयोगकर्ताओं के प्रति अनुक्रिया कर सके। वित्तीय क्षेत्रक के सुधारों के संदर्भ में व्यावसायिक निर्णय के माध्यम से अपने समर्थन का आकलन निर्णय के माध्यम से अपनी समर्थन का आकलन करने के लिए वित्तीय संस्थाओं तथा बैंकों को समर्थ बनाने के लिए भी ऐसी पारदर्शिता आवश्यक है।
- बदलती वैश्विक वास्तविक का औपचारिक मान्यकरण जिसमें ये शामिल हैं :- निवेश प्रवाह तथा व्यापार के बीच नजदीकी संबंध, अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में सफलता के अग्रदूत के रूप में घरेलू अर्थव्यवस्था की सफलता, अनुप्रस्थ निवेशों के माध्यम से प्रौद्योगिकी को निरंतर अद्यतन करने का महत्व, बाजार प्राप्ति तथा संसाधन प्राप्ति निवेशों के बीच अधिक गतिशील संबंध, अंतरराष्ट्रीय प्रवाहों में भौतिक गहनता के बजाए तथा सेवा गहनता की प्रवृत्ति।
- भारतीय वास्तविकताओं का अभिग्रहण करना जिनमें निम्न शामिल है :- भारतीय उद्यमकारिता को वैश्विक बनने की अनुमति द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण का सुदृढ़ीकरण, एक मुख्य आयातक देश होने के नाते वास्तविक निर्यातों से कहीं आगे वैश्विक आर्थिक संबंध को देखते हुए विशाल पूंजी बर्हिप्रवाहों का परिहार करने की आवश्यकता तथा यह सुनिश्चित करना कि भारतीय उद्योग तथा व्यवसाय कुछ क्षेत्रों का क्षेत्रीय ब्लॉकों में महत्वपूर्ण स्थितियां हासिल करें।
भारतीय रिजर्व बैंक के कुछ महत्वपूर्ण परिपत्र तथा दिशानिर्देश हैं :-
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 3 दिनांक 22 जून, 2000
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 13 दिनांक 14 सितंबर, 2000
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 32 दिनांक 28 अप्रैल, 2001
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 16 दिनांक 15 दिसंबर, 2001
- एपी (डीआईआर)) परिपत्र सं. 18 दिनांक 18 दिसंबर, 2001
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 23 दिनांक 19 फरवरी, 2002
- एपी(डीआईआर) परिपत्र सं. 27 दिनांक 2 मार्च, 2002
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 43 दिनांक 30 अप्रैल, 2002
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 51 दिनांक 24 जून, 2002
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 58 दिनांक 2 दिसंबर, 2002
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 66 दिनांक 13 जनवरी, 2003
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 68 दिनांक 13 जनवरी, 2003
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 83 दिनांक 1 मार्च, 2003
- एपी(डीआईआर) परिपत्र सं. 96 दिनांक 28 अप्रैल, 2003
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 97 दिनांक 29 अप्रैल, 2003
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 104 दिनांक 31 मई, 2003
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 107 दिनांक 19 जून, 2003
- एपी (डीआईआर) परिपत्र सं. 97 दिनांक 21 जून, 2004
- एपी ((डीआईआर)) परिपत्र सं. 30 दिनांक 05 अप्रैल, 2006
- एडीआर/जीडीआर से संबंधित भा. रि. बैंक के परिपत्र
- विदेशी वाणिज्यिक उधार से संबंधित भा. रि. बैंक के परिपत्र
- एफसीसीबी से संबंधित भा. रि. बैंक के परिपत्र
- फेमा से संबंधित भा. रि. बैंक के परिपत्र
- भारतीय कम्पनियों द्वारा विदेशी मुद्रा परिवर्तन योग्य बॉन्ड (एफसीसीबी) के पूर्व भुगतान के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत
|