एक उद्यमी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो व्यापार उद्यम का आयोजन करता है और इसके जोखिम उठाता है। परन्तु एक उद्यमी संगठनों के सृजक के अलावा बहुत कुछ होता है, उद्यमशीलता उसकी विशेषता है और यह एक व्यक्ति का गुण है।
ऐतिहासिक रूप से भारत स्वयं रोजगार वाला देश है और यहां नियोक्ता नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था में बड़ी संख्या में कॉर्पोरेट संगठनों में आ जाने के बाद देश में आज आय उत्पादन का अधिकांश हिस्सा छोटे और मध्यम व्यापार स्वामियों पर केन्द्रित है। ये व्यापार राष्ट्रीय आय तथा रोजगार के सबसे बड़े अंशदाता हैं और इन्हें लगातार वित्तीय संस्थानों और नीति निर्माताओं द्वारा समर्थन दिया जाता है।
स्वयं रोजगार राष्ट्र का आधार है। कोने पर स्थित चाय की दुकान से लेकर किराने की दुकान, कबाड़ी वाला और इंटरनेट की छोटी दुकानें, इन सभी उद्यमियों को बढ़ावा देने की जरूरत है तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन्हें प्रतियोगिता के लिए सक्षम बनाना आवश्यक है और भारत सरकार ने नवाचार और विकास के लिए सही सामाजिक – आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र देकर निजी उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के मोर्चे पर सदैव अग्रणी स्थान बनाए रखा है।
उद्यमशीलता की मूल बातें
विचारों को आर्थिक अवसरों में बदलने की गतिविधि उद्यमशीलता के केन्द्र में है। उद्यमशीलता को सुधार और बदलाव के स्रोत के रूप में देखा जाता है और इसके परिणामस्वरूप उत्पादकता तथा आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा में सुधार आता है। वास्तव में यह ज्ञान और नम्यता के साथ नजदीकी संभव रखती है।
वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण द्वारा प्रौद्योगिकी उन्नयन और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के साथ उद्यमशीलता के पोषण से देश की प्रतिस्पर्द्धात्मकता निरंतर परिवर्तित आर्थिक मोर्चे पर देखी जा सकती है। आर्थिक वृद्धि पर उद्यमशीलता के प्रभाव को प्रतिस्पर्द्धा, नवाचार द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है।
एक व्यक्ति को 'स्वयं रोजगार' से परिवर्तित करते हुए 'उद्यमी' बनने की प्रक्रिया एक व्यापार संगठन की स्थापित है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय इस परिवर्तन का सृजक है, अधिकांश नई व्यापार इकाइयां न्यूनतम पूंजी और अधिकतम संकल्पना के साथ आरंभ की गई हैं।
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