सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के साथ खादी और ग्राम एवं ग्रामीण उद्यम देश के समग्र औद्योगिक विकास में एक केन्द्रीय भूमिका निभाती हैं। वे राष्ट्रीय आय में एक महत्वपूर्ण योगदान करता है और देश के औद्योगिक उत्पादन, निर्यात आदि में उनकी विशाल भागीदारी है। वे न केवल देश भर के लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करने में सहायता देते हैं, विशेष रूप से ग्रामीण दस्तकारों और ग्रामीण लोगों को बल्कि वे आर्थिक घनत्व को कुछ ही लोगों के हाथों में सीमित रहने की समस्या पर भी नियंत्रण रखते हैं। वे छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमियों की प्रतिभा, कौशल आदि के विकास और पोषण द्वारा अर्थव्यवस्था में एक सशक्त उद्यमशील आधार का सृजन करते हैं। इस प्रकार इस क्षेत्र को केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा एक प्राथमिकता का दर्जा दिया जाता है।
इसके बावजूद लघु और मध्यम उद्यमों के सामने उनके दैनिक प्रचालनों में अनेक समस्याएं आती है, अर्थात उनके उत्पादों के उत्पादन और विपणन में। उनके लिए पारिश्रमिक के मूल्य पर अपने उत्पादों को बेचना कठिन होता है और वे विज्ञापन, विपणन अनुसंधान आदि पर बहुत अधिक व्यय नहीं कर सकते हैं। वे बड़ी फर्मों से भी कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करते हैं। अपर्याप्त मूल संरचनात्मक सुविधाएं और ऋण तक पहुंच कुछ अन्य बड़ी समस्याएं हैं। लघु और मध्यम उद्यम आम तौर पर मशीनरी, उपकरण और कच्ची सामग्रियों की खरीद के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन जुटाने और अपने दैनिक व्यय पूरे करने में भी असमर्थ होते हैं। पुन: उनके लिए कुशल प्रबंधकीय और तकनीकी कार्मिकों की भर्ती और प्रेरण कठिन होता है। मुख्य रूप से वे संगठन और प्रबंधन की आधुनिक विधियों को अपनाने में अनिच्छुक होते हैं।
यद्यपि लघु और मध्यम उद्यमों के प्रवर्तन और विकास का मुख्य दायित्व संबंधित राज्य / संघ राज्य क्षेत्र सरकारों के पास होता है, परन्तु केन्द्र सरकार ने हमेशा अपने विभिन्न विनियमों के माध्यम से राज्य / संघ राज्य क्षेत्र सरकारों के प्रयासों की पूरकता में सक्रिय दिलचस्पी दिखाई है, क्योंकि लघु और मध्यम उद्यमों में संपदा और रोजगार के स़ृजन तथा अर्थव्यवस्था के संबंधित क्षेत्रों की उचित वृद्धि के संदर्भ में अपार संभाव्यता निहित है। भारत में
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय मुख्य केन्द्र प्राधिकरण है जो लघु और मध्यम उद्यमों की वृद्धि और विकास को प्रोत्साहन देने के लिए राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों के प्रयासों में सहायता देता है। यह अनेक योजनाओं / कार्यक्रमों और नीतियों का कार्यान्वयन करता है ताकि लघु और मध्यम उद्यमों की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाया जा सके। ये मुख्यत: सरलीकृत प्रणालियों और प्रक्रियाविधियों, पूंजी तक आसान पहुंच, वैश्विक मूल्य श्रृंखला में लघु और मध्यम उद्यमों की उत्पादकता को बढ़ा कर उनका स्थान बनाने, प्रौद्योगिकी उन्नयन, गुणवत्ता सुधार, कौशल विकास, घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच आदि से संबंधित हैं।
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