| एक कार्यदक्ष तरीके से फर्म के वित्त साधनों की प्रबंध व्यवस्था करना कारोबार की प्रबंध व्यवस्था का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है। इसका अर्थ है फर्म के वित्तीय संसाधनों का नियंत्रण और प्रबंधन करना। वित्त साधनों के प्रबंधन की प्रक्रिया में नकद-प्रवाह का प्रबंधन शामिल है जो कारोबार में पैसे के अर्न्तप्रवाह और बहिर्प्रवाह से जुड़ा है। इसके लिए नकद प्रवाह विवरण तैयार किया जाता है जो एक व्यवस्थित रूप में कम्पनी की आय और व्यय का रिकॉर्ड रखता है। नकद-प्रवाह विवरण कम्पनियों द्वारा प्रयोग में लाया जाने वाला वित्तीय साधन है जो समय अवधि विशेष में इसकी नकद-प्राप्तियों और संवितरणों का मापन करता है। यह संबंधित अवधि में नकद में हुई नकद वृद्धि या कमी के साथ-साथ प्रचालन, निवेश और वित्तीय कार्यकलाप से संबंधित नकद के बहिर्वाह एवं अन्तर्वाह का विवरण रखता है।
कम्पनी के वित्त साधनों की उपयुक्त प्रबंध व्यवस्था के लिए, लेखांकन का ज्ञान, विशेषकर दोहरी बही –प्रविष्टि के सिद्धांतों की जानकारी अनिवार्य आवश्यकता है। लेखांकन से हमें कम्पनी के विभिन्न लेखा विवरणों को तैयार करने एवं बनाकर रखने की जानकारी तथा ऐसी लेखांकन सूचना को संबंधित पक्षकारों तक कैसे पहुंचाया जाए, इसकी जानकारी मिलती है। ''जनरल लेजर एकाउंट'' कम्पनी द्वारा तैयार किया गया सबसे महत्वपूर्ण लेखा विवरण होता है। यह नामे और जमा नामक दो प्रविष्टियों के ज़रिए कम्पनी के सभी वित्तीय लेन-देनों का रिकॉर्ड रखता है। इसके अलावा, कम्पनी अधिनियम, 1956 के अंतर्गत प्रत्येक कम्पनी से सांविधिक तौर पर अपेक्षा की जाती है कि वह लेखा-विवरण बनाकर रखे। ऐसी बहियां ज़रूरी होती हैं क्योंकि वे कम्पनी की स्थिति की वास्तविक और निष्पक्ष तस्वीर पेश करते हैं। इन लेखा-विवरणों को लेखा परीक्षा के लिए, कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य है (अधिनियम के अंतर्गत) कि वे कम्पनी के ''लेखापरीक्षक'' के रूप में किसी स्वतंत्र व्यक्ति की अनिवार्य नियुक्ति की व्यवस्था करें। यह लेखा-परीक्षक का कर्तव्य है कि वह लेखा-विवरणों की गणितीय यथातथ्यता की जांच करे तथा कम्पनी के लेखांकन मानकों और सदभाव के संबंध में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
वित्तीय प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया कम्पनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति को प्रकट करती है। इस प्रकार इंगित की गई कम्पनी की अच्छी वित्तीय स्थिति बाज़ार में इसकी साख और प्रतिस्पर्धी स्थिति को मज़बूत बनाती है। इसलिए यह किसी भी उद्यम के दीर्घकालिक आधार पर लाभकर तरीके से अबाध एवं सफल कार्यकरण के लिए आवश्यक है।
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