| कर्मचारियों का स्वास्थ्य और सुरक्षा किसी संगठन के सुचारू व कामगार कामकाज में महत्वपूर्ण पहलू हैं; अच्छा स्वास्थ्य और सुरक्षा का वातावरण एक दुर्घटना रहित औद्योगिक ढांचा सुनिश्चित करता है, व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य का रख-रखाव उत्पादकता और अच्छे नियोजक कर्मचारी संबंध से बहुत निकटता से जुड़ा है। भारत में व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति जागरूकता में काफी अधिक सुधार आया है। उच्च व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा की जागरूकता कारोबारी गतिविधियों का एक अति महत्वपूर्ण पहलू बन चुका है।
व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रबंधन के लिए खतरों की पहचान, उनके मूल्यांकन और संगठन में जोखिमों के नियंत्रण के लिए एक संरचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है, भारतीय मानक ब्यूरो ने व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रबंधन प्रणालियों पर एक भारतीय मानक तैयार किया है, यह आईएस 18001:2000 व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रबंधन प्रणालियां के नाम से जाना जाता है, इस मानक में ओएच एंड एस प्रबंधन प्रणालियों के लिए अपेक्षियां निर्धारित की गई हैं ताकि कोई संगठन की गतिविधियों द्वारा प्रभावित हो सकती हैं, को संरक्षित करने के लिए विधायी आवश्यकताओं तथा महत्वपूर्ण खतरों और जोखिमों, जिन्हें संगठन की गतिविधियों द्वारा प्रभावित हो सकती हैं, को संरक्षित करने के लिए विधायी आवश्यकताओं तथा जिनके ऊपर इसका प्रभाव होने की आशा है, को ध्यान में रखते हुए एक नीति और उद्देश्य निरूपित कर सके। इस मानक में सभी अपेक्षाओं को किसी ओएचएंडएस प्रबंधन प्रणाली में समाविष्ट करना आशायित है। इस मानक में विनिर्देश के प्रयोग पर ज्ञानप्रद मार्गदर्शन में भी उपलब्ध कराया गया है।
आईएस 18001 के अनुसार ओएचएंड एस प्रबंधन प्रणाली के लिए लाइसेंस प्राप्त करने के इच्छुक संगठनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे इस मानक के अनुसार प्रणाली का प्रचालन कर रहे हैं, संगठन को भारतीय मानक ब्यूरों के निकटतम क्षेत्रीय कार्यालय में प्रश्नावली ( फार्म iv ) और निर्धारित आवेदन शुल्क के साथ निर्धारित प्रोफॉर्मा ( फार्म x ) के आवेदन करना चाहिए। आवेदन पत्र पर संगठन के मालिक या मुख्य कार्यकारी अधिकारी अथवा संगठन के निमित्त हस्ताक्षर करने के लिए प्राधिकृत अन्य व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। आवेदन पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति का नाम और पदनाम आवेदन पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति का नाम और पदनाम आवेदन प्रपत्र में इस प्रयोजन के लिए रखे गए स्थान में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। प्रत्येक आवेदन के साथ एक दस्तावेजबद्ध व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली दस्तावेजीकरण (जैसे ओएचएस मैनुअल आदि) होना चाहिए।
खान सुरक्षा महानिदेशालय (डीजीएमएस) और कारखाना परामर्श सेवा और श्रम संस्था महानिदेशालय(डीजीएफएएसएलआई) खानों कारखानों और पत्तनों में व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में श्रम और रोजगार मंत्रालय के दो फील्ड संगठन हैं। कारखाना परामर्श सेवा और श्रम संस्था महानिदेशालय (डीजीएफएएसएलआई), कारखाना परामर्श सेवा और संस्था महानिदेशालय, मुम्बई जो श्रम और रोजगार मंत्रालय,का एक संबद्ध कार्यालय है, कारखानों और पत्तनों/डाकों में कामगारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित मामलों में संबंध में मंत्रालय के तकनीकी अंग के रूप में कार्य करता है, खान सुरक्षा महानिदेशक खानों और तेल-फील्डों में सुरक्षा क लिए भारत सरकार की विनियामक एजेंसी है, खान सुरक्षा महानिदेशालय का मिशन खनन उद्योग और प्रगतिशील पेट्रोलियम उद्योग में सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी मानकों, पद्धतियों और कार्य निष्पादन में निरंतर सुधार लाना है।
भारत में व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से संबंधित मुख्य कानून निम्नलिखित हैं :-
कारखाना अधिनियम,1948
- यह कारखानों में कामगारों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, कल्याण और अन्य कामकाजी दशाओं का विनियमन करता है।
- दूसरा प्रवर्तन राज्य सरकारों द्वारा कारखाना निरीक्षणालयों के माध्यम से किया जाता है। कारखाना परामर्श सेवा और श्रम संस्थान महानिदेशालय राज्य सरकारों के साथ कारखानों में कामगारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित मामलों का समन्वय करता है।
- डीजीएफएएसएलआई कामगारों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर मुंबई में केन्द्रीय श्रम संस्थान तथा कलकत्ता, चेन्नै और कानपुर में स्थित तीन अन्य क्षेत्रीय श्रम संस्थानों के माध्यम से प्रशिक्षण, अध्ययन और सर्वेक्षण आयोजित करता है।
खान अधिनियम, 1952
- इसमें कोयला, धात्विक और तेल की खनों में श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण से संबंधित उपायों के उपबंध निहित हैं।
- खान अधिनियम, 1952 में स्वामी (मालिक, पट्टेदार अथवा एजेंट के रूप में परिभाषित) के खानों और खनन कार्यों तथा खानों में स्वास्थ्य और सुरक्षा का प्रबंधन करने के निर्धारित कर्तव्यों को निर्धारित किया गया है। यह खानों में कामकाजी घंटों की संख्या, न्यूनतम मजदूरी दरों और अन्य संबंधित मामलों को भी निर्दिष्ट करता है।
- खान सुरक्षा महानिदेशालय निरीक्षण और पूछताछ करता है, खानों में विभिन्न पदों पर नियुक्ति के प्रयोजन हेतु सक्षमता परीक्षण जारी करता है, श्रमिकों की सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं पर सेमिनार/सम्मेलन आयोजित करता है।
- ऐसी दुर्घटनाओं, जिनके परिणामस्वरूप 10 या अधिक खान मजूदरों की मृत्यु हो जाती है, की जांच पड़ताल के लिए केंद्र सरकार द्वारा जांच न्यायालय गठित किए जाते हैं। अधिनियम के अंतर्गत दायित्व और कर्तव्यों के उल्लघंन के लिए दण्डात्मक और आर्थिक दोनों सजाएं निर्दिष्ट हैं।
डॉक कर्मकार (सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण) अधिनियम, 1986
- इसमें पत्तनों/डॉकों में कार्यरत कामगारों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण से संबंधित उपबंध निहित हैं।
- यह कारखाना परामर्श सेवा और श्रम संस्थान महानिदेशालय द्वारा प्रशासित किया जाता है, यह महानिदेशालय मुख्य निरीक्षक के रूप में कार्य करता है, भारत के 10 प्रमुख पत्तनों अर्थात कलकत्ता, मुम्बई, चेन्नई, विशाखपट्टनम, पायद्वीप, कांडला, मोर्मुगांव, तूतीकोरिन, कोचीन तथा न्यू मंगलौर में डॉक सुरक्षा निरीक्षालय हैं।
- निरीक्षालयों की गतिविधियों का समग्र बल पत्तनों में दुर्घटना दरों और दुर्घटनाओं की संख्या में कमी करना है।
इसके अतिरिक्त कार्य स्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी राष्ट्रीय नीति भी है। नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं :- कल्याण
- कार्य से संबंधित चोटों, मौतों, बीमारियों, आपदा और राष्ट्रीय परिसंपत्तियों की हानि के मामलों में निरतंर कमी।
- कार्य स्थल चोटों और बीमारियों की लागत में निरतंर कमी
- बेहतर कार्य निष्पादन और अनुवीक्षण के साधन के रूप में एक अधिक व्यापक आंकड़ा आधार के लिए संबंधित चोटों, सांधातिकताओं और बीमारियों की कवरेज का विस्तार करना।
- कार्य स्थल संबंधित क्षेत्रों में सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से संबंधित सामुदायिक जागरूकता में निरंतर वृद्धि
- कर्मचारी और कुल मिलाकर समाज के कल्याण में वृद्धि।
कार्यस्थलों पर व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य जोखिमों के प्रबंधन में मौजूद मुख्य अड़चनें बदलते जॉब पैटर्न और कामकाजी संबंधों, स्वरोजगार में वृद्धि, अधिक उप-संविदाकरण, कार्य की आउटसोर्सिंग, होमवर्क तथा बढ़ती हुई संख्या में कर्मचारियों के उनके प्रतिष्ठानों से दूर काम करने से संबंधित है। इसके अतिरिक्त कंप्यूटर नियंमित प्रौद्योगिकियों के प्रभाव तथा अनेक आधुनिक नौकरियों में कार्य में तनाव बढ़ते प्रभाव से गंभीर सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिम हो सकते हैं। अत: एक नियोजक को ऐसी सभी अड़चनों को दूर करने तथा श्रमिक अनुकूल कार्य वातावरण उपलब्ध कराने के हर संभव प्रयास करने चाहिए।
‘कानूनी पहलू’ : खंड में और अधिक ब्यौरे निहित हैं। |