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कर

कर (या शुल्‍क) को किसी व्‍यक्ति या संगठन या संपत्ति को प्राप्‍त सरकारी सेवाओं के बदले में उन पर सरकार द्वारा उद्ग्रहण किए गए वित्तीय प्रभारों के रूप में परिभाषित किया गया है। इन करों को मोटे तौर पर प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष करों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रत्‍यक्ष कर वे कर है जहां करदाता करों का भुगतान सीधे अधिरोपण प्राधिकरण को करता है जैसे आयकर तथा धन कर। जबकि अप्रत्‍यक्ष कर वे कर हैं जो सीधे अधिरोपण प्राधिकरण को अदा नहीं किए जाते बल्कि किसी अन्‍य को अदा किए जाते हैं जो करदाता तथा कर उद्ग्रहण प्राधिकरण के बीच मध्‍यवर्ती कड़ी के रूप में कार्य करता है।

भारत में कर तथा शुल्‍क उद्ग्रहण करने की शक्ति को संविधान के प्रावधानों के अनुसार सरकार के तीन स्‍तरों में वितरित किया गया है। जिन मुख्‍य करों/शुल्‍कों का उद्ग्रहण करने की शक्ति केन्‍द्र सरकार को दी गई है, वे हैं :- आयकर (कृषि आय पर कर के सिवाय जिनका उद्ग्रहण राज्‍य सरकारें कर सकती हैं), सीमा शुल्‍क, केन्‍द्रीय उत्‍पाद शुल्‍क तथा बिक्री कर तथा सेवा कर। राज्‍य सरकारों द्वारा उद्ग्रहण किए जाने वाले प्रधान शुल्‍क हैं :- बिक्री कर (वस्‍तुओं की अंतर-राज्‍य बिक्री पर कर), स्‍टाम्‍प शुल्‍क (सम्‍पत्ति के अंतरण पर शुल्‍क), राज्‍य उत्‍पाद शुल्‍क (एल्‍कोहल के विनिर्माण पर शुल्‍क) भू-राजस्‍व (कृषि/कृषि के अलावा अन्‍य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्‍त भूमि पर उद्ग्रहण) एवं आमंत्रणों पर कर। स्‍थानीय निकायों को संपत्तियों पर कर (भवन इत्‍यादि), चुंगी कर (स्‍थानीय निकायों के क्षेत्रों के भीतर प्रयोग/खपत हेतु वस्‍तुओं की प्रविष्टि पर कर) बाजारों पर कर तथा जलापूर्ति, जलनिकासी इत्‍यादि जैसी जनोपयोगिताओं के लिए कर/प्रयोक्‍ता प्रभारों का उद्ग्रहण करने की शक्ति दी गई है।

आर्थिक सुधारों के परिणामस्‍वरूप भारत की कर प्रणाली में आमूल परिवर्तन आया है। इनमें से कुछ परिवर्तनों में ये शामिल हैं :- कर संरचना का यौक्तिकीकरण; सीमाशुल्‍क की चरम दरों में प्रगामी कमी; घटी हुई कॉर्पोरेट कर दर, सीमाशुल्‍कों को आसियान स्‍तरों के साथ संरेखित करना; मूल्‍यवर्द्धित कर की शुरूआत सुनिश्चित करने के लिए कर कानूनों को सरलीकृत किया गया है।

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