भारत में सुविकसित कर – संरचना मौजूद है। कर व शुल्क वसूल करने की शक्ति को भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार तीन स्तरीय सरकार के बीच वितरित किया गया है। संघ सरकार को जिन मुख्य कर/शुल्क, वसूलने की शक्ति प्रदत्त की गई है, वे इस प्रकार हैं :- आय कर (कृषि आय पर कर के अलावा, जिन्हें राज्य सरकार वसूल कर सकती है) सीमा शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क व बिक्री कर और सेवा कर/राज्य सरकारों द्वारा वसूल किए गए मुख्य कर इस प्रकार है: बिक्री कर (अन्तरा – राज्य के माल की बिक्री पर कर), स्टैंप शुल्क (संपत्ति अंतरण पर कर) राज्य उत्पाद शुल्क (एल्कोहल के विनिर्माण पर शुल्क) भूमि राजस्व (कृषि/गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की गई भूमि पर वसूली) व्यावसायिक व कॉलिंग (मांग) पर मनोरंजन कर और शुल्क/स्थानीय निकायों का संपत्ति कर (भवन आदि) चुंगी (स्थानीय निकायों के क्षेत्र के भीतर प्रयोग/खपत हेतु माल प्रविष्टि पर कर) जलापूर्ति, निकास जल आदि जैसी जनोपयोगी सेवाओं के लिए विपणन व कर/प्रयोक्ता प्रभारों से संबंधित कर वसूल करने की शक्ति प्रदत्त की गई है।
आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप, उदारवादी नीति की दिशा में, भारत में कर प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। कुछ परिवर्तनों में शामिल है :- कर – संरचना का पुनर्गठन करना, सीमा शुल्क की अधिकतम दरों में प्रणामी कटौती, कम की गई निगमित कर की दर, एएसईएएन (एशियन) स्तरों से संबद्ध सीमा शुल्क, शुरू किया गया मूल्य संवर्धित कर, कर – आधार में वृद्धि करना, बेहतर अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कर-कानून को सरलीकृत किया गया है। भारत में कर नीति में विभिन्न प्रकार के निवेशों के लिए कटौती के रूप में कर – अवकाश का प्रावधान किया गया है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों/हिस्सों में स्थित उद्योगों को तथा प्राथमिक क्षेत्रों की प्रोत्साहन देना शामिल है। मूल संरचना के विकास में जुड़े हुए क्षेत्रों के लिए भी कर – प्रोत्साहन उपलब्ध है।
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