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विदेशी कारोबार नीति
भारत में विदेशी कारोबार से संबंधित मुख्‍य विधान विदेशी कारोबार (विकास और विनियम) अधिनियम, 1992 है। इस अधिनियम में देश में होने वाले आयात द्वारा विदेशी कारोबार के विकास और विनियमन की सुविधा प्रदान की गई है और यह भारत से निर्यात तथा इससे जुड़े या आकस्मिक मामलों का भी विकास तथा विनियमन करता है। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, सरकार :- (i) विदेशी कारोबार की सुविधा प्रदान करने वाले और नियंत्रण करने वाले प्रावधान कर सकती हैं; (ii) सभी या किसी मामले में आयातों और निर्यातों को प्रतिबंधित, बाधित और विनियमित कर सकती है और साथ ही उन्‍हें रियायत भी दे सकती है; (iii) आयात और निर्यात नीति बनाने और घोषित करने के लिए तथा इसमें समय-समय पर सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा संशोधन कर सकती है; (iv) आयात-निर्यात नीति के निर्धारण और कार्यान्‍वयन सहित अधिनियम के प्रयोजन हेतु ''विदेशी कारोबार के महानिदेशक'' की नियुक्ति के लिए भी अधिकृत है|

तदनुसार, वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय की स्‍थापना भारत में विदेशी कारोबार के प्रवर्तन और विनियमन से संबंधित सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण अंग के रूप में की गई है। अधिनियम द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए मंत्रालय द्वारा कुछ महत्‍वपूर्ण उद्देश्‍यों के साथ एक नियमित आधार पर मंत्रालय द्वारा एक कारोबार नीति अधिसूचित की जाती है। पूर्व कारोबार नीतियां आत्‍म-निर्भरता और आत्‍म-सक्षमता के उद्देश्‍यों पर आधारित थीं। जबकि बाद की नीतियां निर्यात नियंत्रित वृद्धि, दक्षता में सुधार और भारतीय उद्योगों की प्रतिस्‍पर्धा आदि जैसे कारकों द्वारा प्रेरित थीं।

आर्थिक सुधारों के साथ भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का वैश्‍वीकरण कारोबार नीतियों के निर्धारण्‍ में मार्गदर्शक कारक रहा है। बाद की नीतियों में आरंभ किए गए सुधार के उपाय उदारीकरण, खुलेपन और पा‍रदर्शिता पर केन्द्रित हैं। इनसे कारोबार सुविधा की प्रक्रियाओं को सरल बनाकर निर्यात अनुकूल परिवेश मिला है। नई विदेशी कारोबार नीति (एफटीपी) द्वारा आयात निर्यात नीति के नामकरण को प्रतिस्‍थापित करते हुए वर्ष 2004-09 तक की पांच वर्ष की अवधि के लिए नई विदेशी कारोबार नीति की घोषणा इस दिशा में उठाया गया अगला कदम है। यह भारत में विदेशी कारोबार के समग्र विकास का एक समेकित दृश्‍य विचार में लेती है और इस क्षेत्र के विकास के लिए एक रोडमैप प्रदान करता है। निर्यात विस्‍तार और रोजगार पैदा करने की संभावना वाले क्षेत्रों पर फोकस सहित वैश्विक मर्चेन्‍डाइस कारोबार (अगले पांच वर्षों में) में भारत की हिस्‍सेदारी दो गुनी करने की एक सघन निर्यात नियंत्रित वृद्धि कार्य नीति इस नीति का मुख्‍य आधार गठित करती है। इन सभी उपायों से भारत की अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिस्‍पर्द्धा में वृद्धि होने तक भारतीय निर्यातकों की स्‍वीकार्यता में पुन: वृद्धि में सहायता मिलने की आशा है। यह नीति केन्‍द्रीय उद्देश्‍य तय करती है, मुख्‍य कार्यनीतियों का चयन करती है, फोकस की पहलों को समझाती है, निर्यात प्रोत्‍साहनों की रूपरेखा बनाती है, और निर्यात गतिविधियों से संबंधित प्रक्रिया विधियों के सरलीकरण सहित संस्‍थागत समर्थन से जुड़े मुद्दों को भी संबोधित करती है।

इसके उद्देश्‍यों को पूरा करने के लिए मुख्‍य कार्य नीतियों में शामिल हैं :-
  • नियंत्रणों का अविचलित होना और भरोसे तथा पारदर्शिता का परिवेश बनाना;
  • प्रक्रिया विधियों को सरल बनाना और लेन-देन लागतों के कम करना;
  • निर्यात उत्‍पादों में प्रयुक्‍त निविष्टियों पर सभी लेवी को समाप्‍त करना;
  • विनिर्माण, कारोबार और सेवाओं के लिए भारत को एक वैश्विक हब के रूप में विकसित करने की सुविधा प्रदान करना;
  • अतिरिक्‍त रोजगार अवसर पैदा करने के लिए, विशेष रूप से अर्ध शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में, विशेष केन्द्रित क्षेत्रों की पहचान करना और उनका पोषण करना;
  • भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को प्रौद्योगिकीय और मूल संरचनात्‍मक उन्‍नयन प्रदान करने के लिए, विशेष रूप से पूंजीगत वस्‍तुओं और उपकरणों के आयात के माध्‍यम से करना;
  • इनवर्टेड शुल्‍क संरचना को बंद करना और यह सुनिश्चित करना कि कारोबार संबंधी करारनामों में घरेलू क्षेत्रों को लाभ से वंचित नहीं रखा बया है;
  • सम्‍पूर्ण विदेशी कारोबार श्रृंखला से संबंधित मूल संरचनात्‍मक नेटवर्क का उन्‍नयन;
  • कारोबार मण्‍डल की भूमिका को पुन: परिभाषित करने के माध्‍यम से इसे नया जीवन देना और कारोबार नीति इसके विशेषज्ञों को लगाना; तथा
  • निर्यात कार्यनीति में मुख्‍य सक्रिय व्‍यक्तियों को भारतीय दूतावासों में सक्रिय बनाना।

एफटीपी ने निर्यात विस्‍तार और रोजगार उत्‍पादन की संभावना वाले कुछ विशिष्‍ट प्रबलित क्षेत्रों को चुना है। इन क्षेत्रों में शामिल हैं : (i) कृषि; (ii) हथकरघा और हस्‍तकला; (iii) रत्‍न और आभूषण; और (iv) चमड़ा और जूते आदि। तदनुसार, इन क्षेत्रों के लिए विशिष्‍ट नीतिगत पहलों की घोषणा की गई है।

  • कृषि क्षेत्र के लिए :-
    (i) फलों, सब्जियों, लघु वनोपज के निर्यात को और उनके मूल्‍यवर्धित उत्‍पादों को नई योजना ''विशेष कृषि उपज योजना'' को आरंभ किया गया है। इस योजना के तहत इन उत्‍पादों की निर्यात शुल्‍क मुक्‍त ऋण पात्रता इनकी निविष्टियों तथा अन्‍य वस्‍तुओं के आयात पर दी जाएगी (निर्यात के एफओबी मूल्‍य का 5 प्रतिशत);
    (ii)निर्यात प्रोत्‍साहन पूंजीगत वस्‍तु (ईपीजीसी) योजना के तहत पूंजीगत वस्‍तुओं का शुल्‍क मुक्‍त आयात कृषि निर्यात क्षेत्र (एईज़ेड) में कृषि के लिए ईपीसीजी के अंतर्गत आयातित पूंजीगत वस्‍तुओं की संस्‍थापना की अनुमति;
    (iii) कृषि निर्यात क्षेत्रों के विकास के ‍लिए ''निर्यात योजना की मूल संरचना के विकास के लिए राज्‍यों को सहायता'' से धनराशि की उगाही;
    (iv) बीजों, बल्‍बों, कंदों और पौधरोपण सामग्री में उदारीकरण, औषधीय पौधों तथा जड़ी-बूटियों के उत्‍पादों के निर्यात को प्रोत्‍साहन देने के लिए पौधों के भागों के निर्यात के उदारीकरण के साथ उनके उत्‍पादों और निष्‍कर्षों के निर्यात में भी उदारीकरण।

  • हथकरघा और हस्‍तकला क्षेत्र के लिए :-
    (i) हथकरघा और हस्‍तकलाओं के लिए ट्रिमिंग और एम्‍बेलिशमेंट के निर्यात शुल्‍क‍ रहित आयात के एफओबी मूल्‍य के 5 प्रतिशत में वृद्धि करना;
    (ii) काउंटर वेलिंग शुल्‍क (सीवीडी) से नमूनों को छूट;
    (iii) छोटे विनिर्माताओं के लिए आयात ट्रिमिंग, एम्‍बेलिशमेंट्स तथा नमूनों की हस्‍तकला निर्यात प्रोत्‍साहन परिषद को अधिकृत करना; और
    (iv) एक नया हस्‍तकला विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्‍थापना।

  • रत्‍नों और आभू‍षण क्षेत्र के लिए :-
    (i) स्‍वर्ण और प्‍लेटिनम के अलावा धातुओं के लिए उपभोज्‍यों हेतु निर्यातों के 2 प्रतिशत एफओबी मूल्‍य तक शुल्‍क मुक्‍त आयात की अनुमति;
    (ii) अस्‍वीकृत आभूषणों पर शुल्‍क मुक्‍त पुन: आयात पात्रता में निर्यातों के 2 प्रतिशत एफओबी मूल्‍य की अनुमति ;
    (iii) आभूषणों के वाणिज्यिक नमूनों के शुल्‍क मुक्‍त आयात में एक लाख रु. तक वृद्धि; और
    (iv) प्रतिस्‍थापना योजना के तहत 18 कैरट और इससे अधिक शुद्धता के स्‍वर्ण के आयात की अनुमति।

  • चमड़े और जूते चप्‍पलों के क्षेत्र हेतु, विशिष्‍ट नीतिगत पहलें निवेश और संयंत्र तथा मशीनरी पर सीमा शुल्‍क की दर में कमी लाकर की गई हैं। इनमें शामिल हैं :-
    (i)चमड़ा उद्योग में ट्रिमिंग, एमबॉलिशमेंट तथा जूते चप्‍पलों के घटकों की शुल्‍क मुक्‍त पात्रताओं की सीमा निर्यातों के 3 प्रतिशत एफओबी मूल्‍य तक वृद्धि करना और निर्यातों के चमड़ा क्षेत्र के लिए निर्दिष्‍ट मदों में 5 प्रतिशत एफओबी मूल्‍य के लिए वृद्धि करना;
    (ii) सीमा शुल्‍क से चमड़ा उद्योग पर बहि:स्राव उपचार संयंत्रों की मशीनरी और उपकरणों पर रियायत; और
    (iii) अनुपयुक्‍त आयातित सामग्री (जैसे कच्‍चे हाइड और खालें और गीले नीले चमड़े) के पुन: आयात को अनुमत देना।
प्रगति और नीतिगत उपायों की समीक्षा के लिए प्रत्‍येक वर्ष मंत्रालय द्वारा पांच वर्षीय विदेशी व्‍यापार नीति (एफटीपी) के ''वार्षिक पूरक'' की घोषणा की गई है :-
  • अप्रैल 2005 में घोषित वार्षिक पूरक में अतिरिक्‍त नीतिगत पहलें और पुन: सरलीकृत की गई प्रक्रिया विधियां शामिल हैं। इससे एक अंतर राज्‍यीय कारोबार परिषद की स्‍थापना द्वारा अंतरराष्‍ट्रीय कारोबार को बढ़ाने के लिए एक सहायक परिवेश के सृजन में राज्‍य सरकारों को सक्रिय रूप से शामिल किया गया। उन्‍नत लाइसेंसों की विभिन्‍न श्रेणियां भी प्रक्रियाविधि की सुविधा प्रदान करने और सहज निगरानी के लिए एक एकल श्रेणी में विलीन की गई थीं। इस पूरक में पोल्‍ट्री और डेयरी उत्‍पादों पर ''विशेष कृषि उपज योजना'' के विस्‍तार द्वारा कृ‍षि निर्यातों पर पुन:प्रबलन दिया गया है और सभी कृषि और पौधरोपण मदों के निर्यात पर उप-कर हटा दिया गया है।
  • अप्रैल 2006 में लाए गए वार्षिक पूरक में ''फोकस उत्‍पाद'' और ''फोकस बाजार'' की दोहरी योजनाओं की घोषणा की गई है। ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में रोजगार उत्‍पादन के उद्देश्‍य को पूरा करने के लिए ग्राम और कुटीर उद्योग के उत्‍पादों को ''विशेष कृषि उपज योजना'' में शामिल किया गया था, जिसे ''विशेष कृषि और ग्राम उद्योग योजना'' का नया नाम दिया गया था। भारत को दुनिया के रत्‍न और आभूषणों के केन्‍द्र के रूप में विकसित करने के लिए अनेक उपाय किए गए थे। इन उपायों में शामिल हैं :- (1) कीमती धातु छीलन और प्रयुक्‍त आभूषणों को गलाने, परिष्‍कृत करने तथा पुन:निर्यात की अनुमति देना; (2) परेषण आधार पर आभूषणों के निर्यात की अनुमति देना; (3) पॉलिश किए गए मूल्‍यवान (प्रेशस) और अर्ध मूल्‍यवान (सेमी प्रेशस) पत्‍थरों को उपचार के लिए विदेश भेजने तथा अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में इसकी अच्‍छी कीमत पाने तथा गुणवत्ता बढ़ाने के‍ लिए पुन: आयात करना।
  • इसी प्रकार, 19 अप्रैल 2007 को विदेशी कारोबार नीति के तीसरे वार्षिक पूरक की घोषणा की गई थी (1 अप्रैल 2007 से प्रभावी)। इसके माध्‍यम से आरंभ किए गए कुछ महत्‍वपूर्ण उपाय इस प्रकार हैं :- (i) विदेश में दी गई सेवाओं (निर्यातों से संबंधित) पर सेवा कर से रियायत; (ii) भारत में प्रदान की गई और निर्यातकों द्वारा उपयोगी की गई सेवाओं पर सेवा कर में छूट/रियायत दी जाएगी; (iii) निर्यातकों के वर्गीकरण के लिए ''एक से पांच सितारा निर्यात गृहों''' को बदलकर तार्किक रूप से ''निर्यात गृह और कारोबार घराने'' किया गया तथा निर्यात निष्‍पादन पैरामीटरों में बदलाव किया गया; (iv) ''फोकस बाजार योजना (एफएमएस) और ''फोकस उत्‍पाद योजना (एफएमएस) के तहत अधिकतम सीमा, विस्‍तार और कवरेज को विस्‍तारित करना।
  • वर्ष 2004-2009 के लि विदेश व्‍यापार नीति का अंतिम वार्षिक पूरक अप्रैल 2008 में घोषित किया गया, जिसमें अनेक नवाचारी चरणों का प्रस्‍ताव दिया गया था। इसमें निम्‍नलिखित शामिल थे :

    • ईपीसीजी योजना के तहत आयात कर को घटाकर 5 प्रतिशत से 3 प्रतिशत किया गया ताकि निर्माण और सेवा निर्यातों में आधुनिकीकरण को प्रोत्‍साहन दिया जा सके।

    • आयकर अधिनियम की धारा 10बी के तहत शत प्रतिशत निर्यात उन्‍मुख इकाइयों को आयकर लाभ उपलब्‍ध है जिसे 2009 के एक और वर्ष तक आगे बढ़ाया जा रहा है।

    • खेलों तथा खिलौनों के निर्यात को प्रोत्‍साहन देने तथा उनके द्वारा उठाई गई हानि की क्षति पूर्ति करने के लिए ''केन्द्रित उत्‍पाद योजना'' के तहत ऋण पर कुल मिलाकर 5 प्रतिशत का अतिरिक्‍त कर क्रेडिट प्रदान किया जा रहा है।

    • हमारे ताजा फल और स‍ब्‍जी तथा पुष्‍प संवर्धन के निर्यात को माल भाड़े की ऊंची दर से क्षति हुई है। इस नुकसान को पूरा करने के लिए विशेष कृषि और ग्राम उद्योग योजना के तहत उपलब्‍ध क्रेडिट 2.5 प्रतिशत से अधिक अतिरिक्‍त क्रेडिट देने का प्रस्‍ताव है।

    • रुपए के मूल्‍य में गिरावट के कारण प्रतिकूल रूप से प्रभावित क्षेत्रों को पहले ही दी गई ब्‍याज राहत को आगे एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा रहा है।

    • डीईपीबी योजनाओं को मई 2009 तक जारी रखा जा रहा है।

    26 फरवरी 2009 को घोषित व्‍यापार सुविधा उपाय (विदेश व्यापार नीति 2004-09 का पूरक)

  • निर्यात कार्रवाइयों की वसूली के लिए प्रतीक्षा किए बिना डीईपीबी योजना के तहत ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्‍स;

  • चमड़ा और कपड़ा क्षेत्र के लिए 325 करोड़ रु. का विशेष पैकेज;

  • एसटीसीएल, डायमंड इंडिया, एमएसटीसी, जेम और ज्‍वेलरी ईपीसी तथा स्‍टार ट्रेडिंग घरानों को मूल्‍यवान धातुओं के आयात के लिए नामनिर्दिष्‍ट एजेंसियों के रूप में जोड़ा गया;

  • रत्‍न और आभूषण निर्यात : कार्य किए गए मूंगों पर आयात प्रतिबंध हटाया गया;

  • भीलवाड़ा और सूरत को कपड़ों तथा हीरों के लिए निर्यात उत्‍कृष्‍टता शहर के रूप में मान्‍यता दी गई;

  • प्रमुख व्‍यापारिक घरानों के रूप में मान्‍यता पाने के लिए थ्रेशहोल्‍ड सीमा 7500 करोड़ रु. तक कम की गई;

  • ईपीसीजी योजना के तहत निर्यात बाध्‍यताएं 2008-09 के दौरान निर्यात के लिए 2009-10 तक विस्‍तारित की गई;

  • डीईपीबी / ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप उपयोगिता को प्रतिबंधित मदों के आयात के लिए कर के भुगतान हेतु विस्‍तारित किया गया;

  • कर दोष वापसी का दावा करने तथा अंतिम उत्‍पाद शुल्‍क की वापसी की प्रक्रिया को और अधिक आसान बनाया गया;

  • वीकेजीयूवाई, एफपीएस और एफएमएस के लिए चार प्रतिशत एसएडी के पुन:क्रेडिट की अनुमति दी गई;

  • श्रीनगर में डीजीएफटी का नया कार्यालय खोला जाना है;

  • डीईपीबी के तहत मूल्‍य सीमा को दो उत्‍पादों के लिए संशोधित किया गया;

  • उन्‍नत प्राधिकार और ईपीसीजी के लिए इलेक्‍ट्रॉनिक संदेश अंतरण सुविधा की स्‍थापना की जानी है;

  • निर्यात उन्‍मुख इकाइयों में रत्‍न और आभूषण इकाइयों की अनुमति दी गई है - स्‍वर्ण की 10 किलो ग्राम तक की मात्रा व्‍यक्तिगत रूप से ले जाने की अनु‍मति;

  • 1.4.2002 से पहले जारी उन्‍नत प्‍लाइसेंसों के लिए मोड वेट / सेन वेट प्रमाणपत्र की आवश्‍यकता समाप्‍त;

  • उन्‍नत प्राधिकारों के प्रति निर्यात बाध्‍यता को 36 माह तक आगे बढ़ाया गया;

  • ईंधन पर लगाए जाने वाले उत्‍पाद शुल्‍क की अतिरिक्‍त मात्रा की प्रतिपूर्ति निर्यात उन्‍मुख इकाइयों को दे;

  • सेवाकर दावों की शीघ्र वापसी और वापसी की प्रक्रिया को और अधिक सरल बनाने का प्रयास जारी।

अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय के एक संलग्‍न कार्यालय के रूप में  "विदेश व्‍यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी)" की स्‍थापना की गई है। इसके प्रमुख ''विदेश व्‍यापार महानिदेशक'' हैं और वे भारतीय निर्यात को प्रोत्‍साहन देने के मुख्‍य उद्देश्‍य के साथ विदेशी व्‍यापार नीति / आयात निर्यात नीति के निर्धारण और निष्‍पादन के लिए उत्तरदायी हैं। डीजीएफटी द्वारा निर्यातकों को लाइसेंस भी जारी किए जाते हैं तथा निम्‍नलिखित स्‍थानों पर स्थित 32 क्षेत्रीय कार्यालयों के नेटवर्क के माध्‍यम से उनकी संगत बाध्‍यताओं की निगरानी भी की जाती है :- अहमदाबाद; अमृतसर, बैंगलोर, बड़ौदा (वडोदरा) ; भोपाल ; कोलकाता; चंडीगढ़; चेन्‍नई; कोयम्‍बटूर; कटक; एर्नाकुलम; गुवाहाटी; हैदराबाद; जयपुर; कानपुर; लुधियाना; मदुरै; मुरादाबाद; मुम्‍बई; नई दिल्‍ली ; पणजी; पानीपत; पटना; पुडुचेरी; पुणे; राजकोट; शिलॉन्‍ग; श्रीनगर (जम्‍मू में कार्यरत); सूरत; तिरुवनंतपुरम; वाराणसी; और विशाखापट्नम।

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वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय
विदेशी कारोबार महानिदेशालय (डीजीएफटी)
 
 
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